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Kahani- सुभागी

Updated: Mar 26, 2023


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Kahani- सुभागी


तुलसी महतो अपनी बेटी सुभागी को अपने बेटे रामू से भी ज्यादा पयार करते हैं हलांकी रामू बड़ा था लेकिन सुभागी के सामने कुछ नहीं था सुभागी केवल 11 साल की थी लेकिन घर के खेत बारी के काम में या हर क्षेत्र में पूरी तरह निपुन थी सुभागी की मां लक्ष्मी को दिल ही दिल में डर लगा रहता था कि लड़की को किसी की बुरी नजर न लग जाए |इसीलिये कोई सुभागी की ज्यादा तारीफ न करें इसलिए वह उसे डांटती रहती थी, लेकिन सुभागी को नजर लग ही आगी वो 11 वर्ष की उम्र में विधवा हो गई

घर में कोहराम मच गया लक्ष्मी छाती पिट पिट के रोती तो तुलसी अपना सर पित्ते थे, उनको रोता देखकर सुभागी भी रोती थी मां से पुचती, क्या हुआ मां क्यों रोती हो, मुझे तुम्हें छोड़ कर नहीं जाउ तुम मत रोवो मां| उसकी भोली बात सुनकर मां बाप का कलेजा फटा जाता था। वो सोचता है ईश्वर ये क्या लीला है ये क्या खेल खेला है इस मासूम बच्ची के साथ लोग कहते हैं ईश्वर दयालु हैं क्या यही दया हैं तुम्हारी इस मासूम बच्ची के लिए।

धीरे-धीरे धीरे-धीरे समय का चक्र चलता रहा शुभांगी जवान हो गई तो लोग तुलसी महतो पर दबाव डालने लगे कि लड़की का कहीं घर कर दो जवान लड़की का यू गुमना अच्छा नहीं |

तुलसी ने कहा भाई मैं तो तैयार हूं लेकिन जब शुभांगी माने तो वह तो किसी भी तरह से मान ने को तैयार नहीं तो ठाकुर सज्जन सिंह ने शुभांगी समझ कहा बेटी हम तेरे ही भले को कहते हैं मां बाप बुढे हो गए हैं तुम इस तरह कब बैठी रहोगी और उनका भी कोई भरोसा नहीं वह कब तक जिएंगे।

सुभागी ने कहा चाचा मैं आपकी बात समझ रही हूं लेकिन मेरा मन शादी करने को नहीं कहता मुझे आराम की चिंता नहीं है तुम लोग जो कम कहोगी वह मैं फटाफट कर लुंगी लेकिन मुझे शादी करने का ना कहो अगर आप मेरा चरित्र में कुछ गलतियां देखते हो तो चाहे तो मेरा सर कट लेना मैं अपनी बात की पक्की हूं।

अभी शुभांगी का बड़ा भाई रामू बोला तुम सोचती हो कि भैया कमाएंगे और मैं बैठी मौज करूंगा तो तुम्हारी गलतफहमी है हमने तुम्हारा ठेका नहीं ले रखा।

तबी रामू की दुल्हन भी बोल मैंने किसी का थोड़ा पैसा खाया है जो तुम्हारी सेवा चर्चा करते रहेंगे। शुभांगी ना गर्व से कहा भाभी ना तो मैंने कभी तुम्हारी सेवा करवई है और ना ही कभी तुम्हारी सहायता मांगी है और भगवान ने चाहा तो आप भी नहीं मांगूंगी तुम अपनी देखो मेरी चिंता ना करो।

जब रामू की बहू को पता चलेगा कि शुभांगी अब शादी नहीं करेगी तो वह हमेशा उसे चिढ़ी चिढ़ी रहीने लगी उसकी हर बात में गलती निकलती बात बात पर उससे झगड़ती शुभांगी बेचारी सारे दिन काम करती घर का भी काम कर दिया और खेत में भी कम करती दिन को जल्दी आती है तो सबको खाना बना कर भी खिलाती रात में अपने मन बाप की सेवा करती तुलसी महतो को चिलम का शौक था तो उन्हें बार-बार चिलम भी पिलाती थी जहां तक शुभांगी का बस चलता वह अपने माता-पिता को कोई कम करना न देते। लेकिन अपने भाई को काम से नहीं रोकती थी वह सोचती थी भाई तो जवान आदमी है कम करेगा तभी ही इसकी गर्ग गृहस्थी चलती रहेगी।

एक दिन रामू गुस्से में आप से बहार होकर बोला कि अगर माता-पिता से इतना ही ही प्रेम है तो उनको लेकर अलग रहो घर का सारा कम मैं कर्ता हूं और वाहवाही तुम लूटती हो अगर इतना ही बहादुर हो तो मन बाप के साथ अलग रहो और उनकी सेवा करो तो पता चलेगा।

लेकिन शुभांगी इस बात का कोई जवाब नहीं दिया क्योंकि वह नहीं चाहती थी कि यह बात बड़े उसके मां-बाप भी वहां बैठे सुन रहे लेकिन तुलसी से न रहा गया उसे कहा रामू क्या है क्यों अपनी बहन से लड़के रहते हो. तो रामू बोला तुम बीच में क्यों पढ़ते हो मैं तो उससे बात कर रहा हूं। तुलसी ने कहा जब तक मैं जीवित हूं तब तक तुम इसे बिना बात के नहीं लड़ाई कर सके बेचरी का घर में रखना दू भर कर दिया है।

रामू आपको बेटी बहुत प्यारी है तो आपके गले पड़ कर राही है मुझसे यह सब नहीं सहा जाता मुझे आप अलग कर दीजिए। तुलसी अच्छी बात है अगर तुम्हारी यही इच्छा है तो में आदमियों को और पंचों को बुलाकर बंटवारा कर दूंगा मैं तुमसे अलग रह लूंगा लेकिन शुभांगी से दूर नहीं रहूंगा।

तुलसी को पूराने दिन याद गए जब पुत्र रामू के जन्म पर उन्हें कर्ज लेकर जलसा किया था लेकिन जब शुभांगी बेटी हुई थी तब घर में रूपए होते हुए भी उन्हें कुछ नहीं खर्च किया था था उन्हें समझा था पुत्र को हीरा और पुत्री को पूराने जन्म के पापों का दंड लेकिन हीरा तो बिल्कुल ही बेकार निकला और यह दंड कितना मंगलमय है।

दुसरे दिन तुलसी मैं तो ने गांव के पंचों को बुलाकर कह अब मेरा और रामू का एक साथ निभा नहीं सकता मैं चाहता हूं कि तुम लोग हमारा बंटवारा कर दो जो भी है वह हम में बराबर बंट दो ठाकुर सज्जन सिंह गांव के बड़े सज्जन पुरुष उन्हें रामू को बुलाकर कहा कि वह अपने माता पिता से अलग होना चाहते हैं शर्म आनी चाहिए अपनी औरत के कहने से माता पिता को अलग कर रहे हों। लेकिन रामूधीथ हो चूका था उसे एक ना सुनी और बंटवार करने पर टीका रहा|

तबी शुभांगी वहां आकार बोलती है पिताजी यह सब बंटवारा मेरे करण हो रहा है तो आप मुझे ही अलग कर दो मैं मेहनत मजदुरी कर लुंगी और आपकी सेवा भी कर लुंगी पर अलग घर में रह लुंगी मेरे करण मैं यह बटवारा होता नहीं देख सकती मैं अपने सर पर कलंक लेकर नहीं जीना चाहती।

लेकिन तुलसी बोला बेटी हम तुझे नहीं छोड़ेंगे चाहे पुत्र छूट जाए मैं रामू का मुंह भी नहीं देखना चाहता उसके साथ रहना तो दूर है।तो गांव के पंचों ने स्थिति को समझे हुए बटवारा कर दिया

अब बटवारा होते ही तुलसी और लक्ष्मी की तो मनो जीवन ही बदल गया पहले तो दोनों सारे दिन कुछ न कुछ कम कर ही लेते लेकिन अब तू पूरा विश्राम था शुभांगी उन्हें कुछ काम ना करने देते पहले दोनों ही दूध को तरसे लेकिन शुभांगी कुछ पैसे बचाकर अब तो एक भैंस भी ले ली और अब वह परिवार को अच्छा भोजन मिलाने लगा।

गांव में हर कोई व्यक्ति कि शुभांगी तारीफ कर रहा था कि लड़की नहीं यह तो साक्षात देवी है दो-दो आदमियों का काम भी करती है मन बाप की सेवा भी करती है

लेकिन तुलसी के जीवन में सुख ज्यादा नहीं लिखा था एक दिन तेज बुखार आया 6-7 दिन हो गए लेकिन बुखार नहीं उतरा शुभांगी ने भाई राम को बुलाया लेकिन वह नहीं आया तो आखिरी में ठाकुर सज्जन सिंह को बुलाने जाती है ठाकुर बहुत ही सज्जन पुरुष था और एक बार में ही बुलाते ही गया।

ठाकुर ने तुलसी महत्व की हाल देखी और वह समझ गए कि तुलसी महत्व के जीवन के दिन शुद्ध हो चुके हैं तो आंखों में पानी लाकर बोले मैं तो भाई कैसा है जी, तुलसी बोला बहुत अच्छा है भैया अब तो चलने का समय है शुभांगी के पिता अब तुम ही हो मैं तुम ही को सौंप जाता हूं

सज्जन सिंह ने रोते हुए कहा भैया घबराओ मत भगवान ने चाहा तो तुम अच्छे हो जाओगे और रही बात शुभांगी की तो मैंने हमेशा अपनी पुत्री की ही समझा है जब तक मैं जीवित हूं ऐसा ही रहेगा तुम निश्चित रहो मेरे रहते शुभांगी या तुम्हारी पत्नी लक्ष्मी की तरफ कोई गंदी नजर से ना देख पाएगा और अगर तुम्हारी कोई और भी इच्छा है वह कह दो

तुलसी ने प्रेम से सज्जन सिंह की तरफ देखकर कहा और कुछ नहीं कहूंगा भैया भगवान तुम्हें सदा सुखी राखी और तुलसी की जीवन लीला समाप्त हो जाती है।

महतो का पुत्र रामू आखिरी समय में भी नहीं आता है जब तुलसी महतो की तेरहवी का समान आता है तो गांव वाले देखते रहते हैं बरतन, कपडे, घी, शक्कर सभी समान ले आती है शुभांगी और रामू देख कर जलता है और शुभांगी उसे जलाने के लिए सबको ही समान दिखती थी

लक्ष्मी ने कहा बेटी घर देख कर खर्च करो हमारे पास कमने वाला कोई नहीं है तो शुभांगी बोली बाबूजी का कम है धुमधाम से ही होगा चाहे घर है या चला जाए बाबूजी वापस थोड़ी आएंगे और मैं भैया को भी दिखाना चाहता हूं कि एक पुत्री क्या कर शक्ति है वह सोच रहे होंगे कि हम कुछ नहीं कर पाएंगे।

तेरहवी का काम अच्छी तरह से पूरा हुआ लोग भोजन करके चले गए गांव वालों ने लक्ष्मी की और शुभांगी खूब वाहवाही की | शाम का समय था केवल शुभांगी बच्ची हुई छेजेन उठा कार रख रही थी कि ठाकुर सज्जन सिंह ने आकार कहा बेटी तुम भी आराम करो यह कम काम सवेरे कर लेना

शुभांगी ने कहा- नहीं दादा अभी थकी नहीं हूं तुम्हारे वह पैसे जोड़े कितने रुपये लगे तो सज्जन सिंह ने कहा पूछ कर क्या करोगी बेटी शुभांगीबोली कुछ नहीं यूं ही पूछती

सज्जन सिंह ने जबाव दिया कोई ₹300 लगे शुभांगी ने कहा मैं इन रुपयों की देनेदार हूं ठाकुर सज्जन सिंह ने कहा मैं तुमसे पैसे नहीं मांगता तुलसी मेरे मित्र और भाई उसके साथ मेरा भी कुछ धर्म है तो शुभांगी ने कहा आपकी यह सोच ही बहुत अच्छी है लेकिन आपने मुझसे प्रति इतना विश्वास किया और ₹300 दिए तो मैं वह जरूर चूका हूं सज्जन सिंह ने कहा जैसी तुम्हारी इच्छा |

लक्ष्मी उन औरतों में से उनके लिए पति ही सब कुछ था 50 वर्ष पति के साथ रहने के बाद अकेले रहना उसके लिए पहाड़ सा हो गया उसकी कितनी बार ईश्वर से प्रार्थना की थी कि हे भगवान मुझे अपने पति से पहले उठा लेना लेकिन वह प्रार्थना तो पूरी नहीं हुई आप लक्ष्मी भी धीरे- धीरे अपनी पति की याद में बीमार रहाणे लगी धीरे-धीरे-धीरे-धीरे उसे भी खाना पीना छोड़ दिया और उसके शरीर को भी बुखार ने पकड़ लिया और खांसी आने लगी और दुर्बलता से जल्दी ही खाट भी पकड़ ली |

मां की दशा देखकर शुभांगी समझ गई कि उनका समय भी आ चुका है पिताजी को भी तो ऐसा ही बुखार हुआ था सज्जन सिंह दोन समय आते और लक्ष्मी को देखते दवा पिलाते और शुभांगी को समझ कर चलते मगर लक्ष्मी की दशा बिगाड़ती जाती और 15वे दिन वह भी संसार से स्वर्ग चली गई अंत समय में पुत्र रामू आया और उनके जोड़े छूना चाहता था लेकिन लक्ष्मी की बात याद थी इसलिये डर से वह उसके सामीप ना जा सके

लक्ष्मी ने जाती-जाते शुभांगी को आशीर्वाद दिया तेरे जैसी बेटी पाकर मैं तो धन्य हो गई मेरा क्रिया कर्म पूरी में ही करना और भगवान से मेरी अर्जी है कि मुझे हर जन्म में तुम ही मेरी कोख से जन्म हो

माताजी के स्वर्गवास केके बाद सुभांगी के के जीवन का केवल एक ही लक्ष्य रहा गया था ठाकुर सज्जन सिंह के पैसे चुकाना 300 रुपये तो पिता के क्रिया कर्म में लग गए और लग गए ₹200 माता जी के कार्यक्रम में लग गए कुल मिलकार ₹500 काकर्ज था और वह अकेली लेकिन वह हिम्मत ना हारी थी

3 साल तक शुभांगी ने रात और दिन कम किया और अपनी खेती बड़ी के कम में भी लगी रही हर 30वे दिन वह ₹15 rupaye लेकर सज्जन सिंह के पास पहुंचती और यह कर्म कभी नहीं टूटा जब तक कि वह पैसे चुक नहीं गए हैं। जिस दिनसुभांगी अपनी आखिरी किस चुकाने गई उसकी खुशी का कोई ठिकाना नहीं था

सज्जन सिंह ने कहा बेटी तुम्हारी एक प्रार्थना है मुझसे तुम कहो तो कहां लेकिन वचन दो तुम मनोगी सुभांगी ने कहा दादा आपकी बात ना मनुंगी तो किसकी बात मनूंगी

सज्जन सिंह ने कहा मैंने तुमसे यह बात अब तक इसलिये नहीं कहीं कि कहीं तुम यह ना समझोगे तुम मेरी देंदार हो अब तुम्हारे रूपे चुक गए हैं मेरा तुम्हारे ऊपर कोई अहसान नहीं है रत्ती भर भी नहीं इसमें मैं कहता हूं मेरी इच्छा है कि तुम मेरी बहू बनकर मेरे घर को पवित्र करो मैं जात-पात के बंधन नहीं मानता मेरा पुत्र भी तुम्हारे नाम का पुजारी है बोलो तुम इसे मंजूर करती हो।

सुभांगी खुश हो कर बोली दादा इतना सम्मान पाकर मैं पागल हो जाउंगी मैं तो आपको अपना पिता समझती हूं आप जो कुछ करेंगे मेरे भले के लिए ही करेंगे मैं आपके आदेश को इनका नहीं कर सकती मुझे यह मंजूर है। सज्जन सिंह ने सुभांगी के माथे पर हाथ रखकर आशीर्वाद देते हुए कहा बेटी तुम्हारा सुहाग अमर हो तुमने मेरी बात राख ली मुझमें जैसा भाग्यशाली संसार में अभी कोई नहीं होगा|


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