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Kabir Ke Dohe:कबीर के दोहे

Updated: May 27, 2023



Kabir Das Ke Dohe: An Insight into the Teachings of the Great Saint


Kabir was a 15th-century Indian saint, poet, and philosopher who composed many verses, known as "dohe," that continue to inspire and educate people even today. His dohe are simple yet profound, and they touch upon various aspects of life such as spirituality, morality, and humanity. In this article, we'll explore 20 of Kabir's dohe and provide explanations to help you better understand Kabir Ke Dohe:कबीर के दोहे meanings.


संत कबीर दास जी के दोहे हिंदी अर्थ सहित (2023) | Sant Kabir Das Ji Ke Dohe Hindi Mein



Kabir Ke Dohe:कबीर के दोहे -viral trends
Kabir Ke Dohe:कबीर के दोहे

कबीर साहब उन चंद आत्म ज्ञानियों में से एक हैं, जिन्होंने पृथ्वी पर जन्म लिया था। उन्होंने सत्य को बेबाक तरीके से दुनिया के सामने रखकर लोगों को उसका आइना दिखाया और सोचने पर मजबूर किया। कबीर शाहब का जन्म 1498 में बनारस में हुआ था और उन्होंने अपने गुरु रामानंद से अपनी शिक्षा प्राप्त की थी।




आज हम इस ब्लॉग पोस्ट में Sant Kabir Das Ji Ke Dohe के बारे में जानने वाले हैं हालाँकि Kabir Das Ji Ke Dohe संस्कृत भाषा में उपलब्ध है लेकिन मैंने हिंदी अनुवाद साथ में दिया है।


कबीर जी के दोहे पढ़कर आप दुनिया को बहुत अच्छी तरह से समझ सकते हैं और माया को पहचान सकते हैं इसलिए यह जरुरी है की हर कोई kabir ke dohe Hindi Mein पढ़े।


संत कबीर दास जी के दोहे – Sant Kabir Das Ji Ke Dohe Hindi Mein

चलिए बिना समय गवाए संत कबीर जी के दोहे पढ़ते हैं और अमृत वाणी का आनंद लेते हैं।



दुख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोय ।

जो सुख में सुमिरन करे, दुख कहे को होय ।।


कबीर साहब कह रहे हैं की दु :ख में तो ईश्वर को सभी याद करते हैं लेकिन सुख में कोई याद नहीं करता। लेकिन अगर आप ईश्वर को सुख में याद करेंगे तो फिर दुख नहीं होगा।


साई इतना दीजिये, जा में कुटुम समाय ।

मै भी भूखा न रहूँ, साधू न भूखा जाय ॥


कबीर साहब ईश्वर से प्रार्थना करते हैं की हे परमेश्वर तुम मुझे इतना दो की जिसमे परिवार का गुजारा हो जाय। मुझे भी भूखा न रहना पड़े और कोई अतिथि अथवा साधू भी मेरे द्वार से भूखा कभी न लौटे।


गुरु गोविंद दोनों खड़े, काके लागूं पाँय ।

बलिहारी गुरु आपनो, गोविन्द दियो बताय ।।


कबीर साहब कह रहे हैं की गुरु और परमात्मा दोनों मेरे सामने खड़े हैं मैं किसके पाँव पड़ूँ? क्यूंकि दोनों हीं मेरे लिए समान हैं। लेकिन यह तो गुरु कि हीं बलिहारी है जिन्होने मुझे परमात्मा की ओर इशारा कर के मुझे गोविंद (ईश्वर) की कृपा के पात्र बनाया।


जाति न पुछो साधू की, पूछ लीजिये ज्ञान ।

मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान ॥


कबीर साहब कहते हैं की किसी साधू से उसकी जाति न पुछो बल्कि उससे ज्ञान की बात पुछो। इसी तरह तलवार की कीमत पुछो म्यान को पड़ा रहने दो, क्योंकि तलवार का महत्व होता है म्यान का नहीं।


सुख में सुमिरन न किया, दु:ख में किया याद ।

कह कबीरा ता दास की, कौन सुने फ़रियाद ॥


सुख में तो कभी याद किया नहीं और जब दुख आया तब याद करने लगे, उस दास की प्रार्थना कौन सुनेगा ।


कबीर माला मनहि कि, और संसारी भीख ।

माला फेरे हरि मिले, गले रहट के देख ॥


कबीर साहब ने कहा है कि माला तो मन कि होती है बाकी तो सब लोक दिखावा है। अगर माला फेरने से ईश्वर मिलता हो तो रहट के गले को देख, कितनी बार माला फिरती है। सिर्फ मन की माला फेरने से हीं परमात्मा को प्राप्त किया जा सकता है ।


लूट सके तो लूट ले, राम नाम की लूट ।

पाछे फिर पछताओगे, प्राण जाहिं जब छूट ॥


कबीर साहब कह रहे हैं की हे प्राणी, चारो तरफ ईश्वर के नाम की लूट मची है, अगर लूटना चाहते हो तो लूट लो, और अगर नहीं लूटोगे और जब समय निकल जाएगा तब तू पछताएगा। अर्थात जब तेरे प्राण निकल जाएंगे तो परमात्मा का नाम कैसे जप पाएगा ।


जहाँ दया तहाँ धर्म है, जहाँ लोभ तहाँ पाप ।

जहाँ क्रोध तहाँ काल है, जहाँ क्षमा तहाँ आप ॥


कबीर साहब कहते हैं की जहाँ दया है वहीं धर्म है और जहाँ लोभ है वहाँ पाप है, और जहाँ क्रोध है वहाँ काल है। और जहाँ क्षमा है वहाँ स्वयं परमात्मा होते हैं।


जहाँ ग्राहक तंह मैं नहीं, जंह मैं ग्राहक नाय ।

बिको न यक भरमत फिरे, पकड़ी शब्द की छाँय ।।


कबीर साहब कह रहे हैं की जहाँ ग्राहक हैं वहाँ मैं नहीं और जहाँ मैं वहाँ ग्राहक नहीं यानी मेरी बात को मानने वाले नहीं है। लोग बिना ज्ञान के भ्रम में फिरते रहते हैं।


जाके जिभ्या बन्धन नहीं हृदय में नाहिं साँच ।

वाके संग न लागिये, खाले वटिया काँच ।।


जिसे अपने जीभ पर संयम नहीं और मन में सच्चाई नहीं, तो ऐसे मनुष्य के साथ आपको कुछ नहीं प्राप्त होगा।



kabir ji ke dohe in hindi

जग में बैरी कोई नहीं, जो मन शीतल होय ।

यह आपा तो डाल दे, दया करे सब कोय ।।


अगर आपका मन शीतल है तो संसार में आपका कोई दुश्मन नहीं है, अगर आप अपना घमंड उतार देंगे तो आपपर सब दया करेंगे।


झूठे सुख को सुख कहै, मानता है मन मोद ।

जगत चबेना काल का, कुछ मुख में कुछ गोद ।।


कबीर साहब कहते हैं की लोग झूठे सुख को सुख मानते हैं और खुश रहते हैं लेकिन उन्हें यह नहीं पता की यह संसार समय का चबैना है जिसमें आधे ख़त्म हो चुके हैं और आधे बाकी हैं।


जो तू चाहे मुक्ति को, छोड़ दे सबकी आस ।

मुक्त ही जैसा हो रहे, सब कुछ तेरे पास ।।


कबीर साहब कह रहे हैं की अगर आप मुक्ति चाहते हैं तो सब की आस छोड़कर परमात्मा जैसा हो जाओ उसके बाद आप सब कुछ पा जाएंगे।


जो जाने जीव आपना, करहीं जीव का सार ।

जीवा ऐसा पाहौना, मिले न दूजी बार ।।


जो अपने जीवन को समझता है वह अपने जीवन को राम को समर्पित कर देता है क्यूंकि उसे पता है दोबारा जीवन नहीं मिलेगा।


जो जन भीगे राम रस, विगत कबहूँ ना रुख ।

अनुभव भाव न दरसे, वे नर दुःख ना सुख ।।


जैसे सूखे पेड़ पर फल नहीं लगता है वैसे ही बिना राम के कोई फल फूल नहीं सकता, और जिसके मन में राम नाम के सिवा दूसरा भाव नहीं है उसे सुख दुःख का बंधन नहीं है।


तीरथ गए से एक फल, सन्त मिलै फल चार ।


सतगुरु मिले अधिक फल, कहै कबीर बिचार ।।


कबीर साहब कहते हैं की जब कोई तीर्थ जाता है तो उसे एक गुना फल मिलता है, जब किसी को संत मिलते हैं तो उसे चार गुना फल प्राप्त होते हैं और जब किसी को गुरु मिलते हैं तो उसे कई गुना फल प्राप्त होते हैं।


तिनका कबहुँ न निंदिये, जो पाँव तले भी होय ।


कबहुँ उड़ आँखों पड़े, पीर घनेरी होय ।।


कबीर साहब कह रहे हैं की तिनके का निंदा कभी नहीं करना चाहिए चाहे वह आपके पैर के निचे ही क्यों न हो, क्यूंकि अगर यह नेत्र में चला जाता है तो हमारे नेत्र को क्षति पहुंचा सकता है।


ते दिन गये अकारथी, संगत भई न संत ।


प्रेम बिना पशु जीवना, भक्ति बिना भगवंत ।।


आपके जीवन के वो दिन जिसमें संत की संगत नहीं हुई वो व्यर्थ ही बीत गएँ, बिना प्रेम के आपका जीवन पशु समान है और बिना भक्ति के आपको भगवान नहीं मिल सकते अर्थात बिना भक्ति के आपका जीवन बेकार है।


kabir ji ke dohe in hindi

तेरा साईं तुझ में, ज्यों पहुन में बास ।


कस्तूरी का हिरण ज्यों, फिर-फिर ढूँढ़त घास ।।


कबीर साहब कहते हैं की जिस तरह फूलों में सुगंध रहती है वैसे ही तेरा भगवान् तेरे अंदर ही है लेकिन जैसे कस्तूरी हिरण अपने अंदर छिपी हुई कस्तूरी को अज्ञान से घांस में ढूंढता है वैसे ही तू ईश्वर को अपने से बाहर खोजता है।


तीर तुपक से जो लड़ै, सो तो शूर न होय ।


माया तजि भक्ति करे, सूर कहावै सोय ।।


कबीर साहब कहते हैं की वह वीर नहीं है जो सिर्फ धनुष और तलवार से लड़ाई करता है, सच्चा वीर वो है तो माया को त्याग करके भक्ति करता है।


तन को जोगी सब करे, मन को बिरला कोय ।


सहजै सब बिधिपाइये, जो मन जोगी होय ।।


तन से तो सभी जोगी होते हैं लेकिन कोई बिरला ही मन से जोगी होता है और जो मन से जोगी हो जाता है वह आसानी से सब कुछ पा लेता है।


दिल का मरहम कोई न मिला, जो मिला सो गर्जी ।


कहे कबीर बादल फटा, क्यों कर सीवे दर्जी ।।


कबीर साहब कहते हैं की इस संसार में ऐसा कोई नहीं मिला जो मन को शांति प्रदान कर सके जो भी मिला वो खुदगर्ज ही थें, संसार में स्वार्थियों को देखकर मन रूपी आकाश फट गया है इसे दर्जी नहीं सिल पाएंगे।


तब लग तारा जगमगे, जब लग उगे नसूर ।


तब लग जीव कर्मवश, जब लग ज्ञान ना पूर ।।


जैसे जब तक सूर्योदय नहीं होता है तब तक आकाश में तारें दीखते हैं, इसी प्रकार जब तक जीव को पूर्ण ज्ञान प्राप्त नहीं होता है तब तक वह अपने कर्मों के वश में रहता है।


तन बोहत मन काग है, लक्ष योजन उड़ जाय ।


कबहुँ के धर्म अगमदयी, कबहुँ गगन समाय ।।


मनुष्य का शरीर विमान के समान है और मन कागज के समान है कभी नदी में तैरता है तो कभी आकाश में उड़ता है।


दुर्लभ मानुष जनम है, देह न बारम्बार ।


तरुवर ज्यों पत्ती झड़े, बहुरि न लागे दार ।।


मनुष्य का जन्म बहुत दुर्लभ है और यह बार बार नहीं मिलता है जैसे पेड़ का पत्ता झड़ जाने के बाद दोबारा वही पत्ता पेड़ पर नहीं लग सकता है।


दस द्वारे का पिंजरा, तामें पंछी मौन ।


रहे को अचरज भयौ, गये अचम्भा कौन ।


कबीर साहब कह रहे हैं की मनुष्य के शरीर से प्राण वायु दस द्वारों से निकल सकता है और इसमें कोई अचरज की बात नहीं है।


दया आप हृदय नहीं, ज्ञान कथे वे हद ।


ते नर नरक ही जायंगे, सुन-सुन साखी शब्द ।।


जिनके हृदय में दया नहीं है और ज्ञान की कथाएं सुनते हैं वे चाहे सौ शब्द ही क्यों न सुन लें उन्हें उनको नर्क ही मिलेगा।


दया कौन पर कीजिये, कापर निर्दय होय ।


साईं के सब जीव है, कीरी कुंजर दोय ।।


कबीर साहब कह रहे हैं की आपको यह नहीं सोचना चाहिए की किसपर दया करें और किसके लिए निर्दयी हो जाएँ क्यूंकि सब ईश्वर के ही जीव हैं उन्हें समान मानना चाहिए।


नहिं शीतल है, चंद्रमा, हिम नहिं शीतल होय ।


कबिरा शीतल संतजन, नाम स्नेही होय ।।


कबीर साहब कह रहे हैं की न ही चन्द्रमा शीतल है और न ही हिम शीतल है, असली शीतलता तो संत के हृदय में होती है।


धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय ।


माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय ।।


कबीर साहब कह रहे हैं की हे मन सब कुछ धीरे धीरे हो जाएगा जैसे माली पौधों को सौ घड़ा पानी से सींचता है लेकिन फल तो ऋतू में ही आते हैं।


प्रेम पियाला जो पिये, सीस दक्षिणा देय ।


लोभी शीश न दे सके, नाम प्रेम का लेय ।।


जिस व्यक्ति के हृदय में प्रेम होता है वह प्रेम का प्याला पीता है और समय आने पर प्रेम को बचाने के लिए अपने सर को दक्षिणा के रूप में आहुति दे देता है लेकिन लोभी व्यक्ति प्रेम का सिर्फ नाम लेते हैं पर समय आने पर वह प्रेम को बचाने के लिए कुछ नहीं करते हैं।


न्हाये धोये क्या हुआ, जो मन मैल न जाय ।


मीन सदा जल में रहै, धोये बास न जाय ।।


नहाने धोने से कुछ नहीं होता है जब तक आप मन का मैल यानी पाप नहीं धोएंगे जैसे मछली हमेशा पानी में रहती है लेकिन फिर भी उसका दुर्गन्ध नहीं जाता है।


पाँच पहर धन्धे गया, तीन पहर गया सोय ।


एक पहर भी नाम बिन, मुक्ति कैसे होय ।।


कबीर साहब कहते हैं की मनुष्य पाँच पहर अपना व्यवसाय करता है और तीन पहर सोता है लेकिन प्रभु का नाम एक भी पहर नहीं लेता तो मुक्ति कैसे होगी।


प्रेम न बारी ऊपजै, प्रेम न हाट बिकाय ।


राजा परजार जोहि रुचे, सीस देइ ले जाए ।।


प्रेम न तो बगीचे में उगता है और न ही बाज़ार में बिकता है, राजा हो या प्रजा प्रेम उसे ही नशीब होता है जिसे अपने शीश की रुचिपूर्वक बलिदान स्वीकार हो।


kabir ji ke dohe in hindi

पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ, पंडित हुआ न कोय ।


ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय ।।


कबीर साहब कहते हैं की कितने ही लोग पुस्तकों का पाठ करते करते ख़त्म हो गए और पंडित नहीं हो पाए लेकिन जो प्रेम करना सीख लेता है वही असली पंडित होता है।


पानी केरा बुदबुदा, अस मानस की जात ।


देखत ही छिप जाएगा, ज्यों सारा परभात ।।


कबीर साहब कहते हैं की मनुष्य का जीवन पानी के बुलबुले के समान है जो की कुछ ही पलों में खत्म हो जाता है जैसे सुबह होने पर सारा तारांगण छिप जाता है।


पाहन पूजे हरि मिलें, तो मैं पूजौं पहार ।


याते ये चक्की भली, पीस खाय संसार ।।


कबीर साहब कहते हैं की अगर सिर्फ पत्थर पूजने से हरी मिलते तो मैं पूरा पहाड़ पूजता, इससे अच्छा तो आंटा पीसने वाली चक्की का पूजन है जिसका पीसा हुआ आंटा सारा संसार खाता है।


पत्ता बोला वृक्ष से, सुनो वृक्ष वनराय ।


अब के बिछुड़े ना मिले, दूर पड़ेंगे जाय ।।


पत्ता पेड़ से बिछड़ते हुए कह रहा है की हे वृक्ष वनराय अब हम बिछड़ रहे हैं और कभी नहीं मिलेंगे मैं कहीं दूर हो जाऊँगा। इसमें कबीर साहब कह रहे हैं की अभी मनुष्य योनि मिला है तो सही कर्म कर लो वरना इसके अलावा कौनसी योनि प्राप्त होगी नहीं पता।


फल कारण सेवा करे, करे न मन से काम ।


कहें कबीर सेवक नहीं, चहै चौगुना दाम ।।


कबीर साहब कह रहे हैं की जो व्यक्ति सिर्फ फल के लालच में सेवा करता है बिना मन से वो असली सेवक नहीं है।


फुटो आँख विवेक की, लखें न संत असंत ।


जिसके संग दस बीच है, ताको नाम महन्त ।।


जिसे विवेक है उसके लिए संत और असंत के बीच अंतर् नहीं बचता है, लेकिन सामान्य मनुष्य जिसे दस लोगों के साथ देख लेता है उसे ही वह महान समझने लगता है।


प्रेमभाव एक चाहिए, भेष अनेक बजाय ।


चाहे घर में बास कर, चाहे बन को जाय ।।


कबीर साहब कह रहे हैं की आप कितने ही भेष बदलकर चाहे जंगल जाएँ या फिर घर में रहें लेकिन प्रेमभाव एक ही होना चाहिए।


बन्धे को बाँधना मिले, छूटे कौन उपाय ।


कर संगति निरबंध की, पल में लेय छुड़ाय ।।


जिस प्रकार जब किसी बंधे हुए व्यक्ति को बंधा हुआ व्यक्ति मिले जाए तो वे लोग मुक्त होने के लिए एक दूसरे की मदद नहीं कर सकते हैं उसी प्रकार अगर आपको माया से मुक्त होना है तो ऐसे पुरुष की संगती करें जो की खुद माया से मुक्त हो।


बूँद पड़ी जो समुद्र में, ताहि जाने सब कोय ।


समुद्र समाना बूँद में, बूझै बिरला कोय ।।


कबीर साहब कह रहे हैं की यह तो सभी को ही पता है की समुद्र में बूँद समा जाता है लेकिन यह सिर्फ विवेकी पुरुष ही समझता है की किस प्रकार समुंद्र रूपी मन बून्द रूपी आत्मा में समा जाता है।


बाहर क्या दिखराइये, अन्तर जपिए राम ।


कहा काज संसार से, तुझे धनी से काम ।।


कबीर साहब कह रहे हैं की बाहर बाहर से राम का नाम लेने से कोई फायदा नहीं है अपने हृदय से राम का नाम लो, क्यूंकि तुम्हारा काम संसार से नहीं भगवान से है।


बानी से पहचानिए, साम चोर की घात ।


अंदर की करनी से सब, निकले मुँह की बात ।।


आप सज्जन और दुष्ट व्यक्ति को उसकी बातों से ही पहचान सकते हैं क्यूंकि जो उसके मन में होता है उसी बात को अपने मुख से कहता है।


बलिहारी गुरु आपने, घड़ी-घड़ी सौ बार ।


मानुष से देवत किया, करत न लागी बार ।।


कबीर साहब कहते हैं मैं गुरु की बलिहारी सौ बार करता हूँ क्यूंकि उन्होंने मुझे मनुष्य से देवता बना दिया बिना देर किये।


बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर ।


पंछी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर ।।


कबीर साहब कहते हैं खजूर पेड़ बहुत बड़ा होता है लेकिन पक्षी को छाया नहीं मिलता और फल बहुत दूर लगता है, उसी प्रकार जो बड़े आदमी होते हैं अगर वो कुछ सार्थक काम नहीं करते तो वे सब व्यर्थ हैं।


माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर ।


कर का मनका डार दे, मनका मनका फेर ।।


कबीर साहब कह रहे हैं की लोग माला फेरते फेरते अपना जीवन निकाल देते हैं लेकिन फिर भी उन्हें सत्य की प्राप्ति नहीं होती है, अगर कोई सत्य की प्राप्ति चाहता है तो माल छोड़कर दिल से ईश्वर की आराधना करो।


भक्ति गेंद चौगान की, भावे कोई ले जाय ।


कह कबीर कछु भेद नहिं, काह रंक कहराय ।।


कबीर साहब कह रहे हैं की भक्ति दो पोलों के गेंद के समान है कोई भी ले जाए क्या फर्क पड़ता है इसी प्रकार राजा और कंगाल में भी भेद नहीं है चाहे कोई भी भक्ति करें।


भूखा भूखा क्या करे, क्या सुनावे लोग ।


भांडा घड़ निज मुख दिया, सोई पूरण जोग ।।


कबीर साहब कह रहे हैं की तुम खुद को भूखा भूखा कह कर दुनिया को क्या सुनाता है, जिस ईश्वर ने तुझे यह शरीर और मुख दिया है वही तेरे काम पूर्ण करेगा।


माया मरी न मन मरा, मर मर गए शरीर ।


आशा तृष्णा ना मरी, कह गए दास कबीर ।।


कबीर साहब कहते हैं की शरीर और माया अंत में मर जाता है लेकिन आशा, मन, और तृष्णा नहीं मरता है।


मार्ग चलत में जो गिरे, ताको नाहीं दोष ।


कह कबीर बैठा रहे, ता सिर करड़े कोस ।।


मार्ग में चलते चलते जो गिर जाता है उसका कोई दोष नहीं है लेकिन जो बैठा रहता है और उसपर कोस बने रहते हैं उसके लिए कुछ करना न करने से अच्छा होता है।


मैं अपराधी जन्म का, नख-सिख भरा विकार ।


तुम दाता दुख भंजना, मेरा करो सम्हार ।।


हे प्रभु।मैं तो इस जन्म का अपराधी हूँ मेरे शरीर में ऊपर से लेकर निचे तक विकार भरा है, आप सभी के दाता हैं आपही मेरा उद्धार करो।


मूँड़ मुड़ाये हरि मिले, सब कोई लेय मुड़ाय ।


बार-बार के मूड़ते, भेड़ न बैकुण्ठ जाय ।।


कबीर साहब कहते हैं की अगर सर के बाल छिलाने से हरी मिल जाते तो सब लोग अपने सर के बाल छिला लिए होते, जैसे भेड़ के शरीर के बाल को बार बार छिला जाता है फिर भी वह बैकुंठ नहीं पहुँचता।


माया तो ठगनी बनी, ठगत फिरे सब देश ।


जा ठग ने ठगनी ठगो, ता ठग को आदेश ।।


कबीर साहब कह रहे हैं की माया सभी देश को ठग लेती है लेकिन जो माया को ठग लेता है वही आत्मा है।


भज दीना कहूँ और ही, तन साधुन के संग ।


कहैं कबीर कारी गजी, कैसे लागे रंग ।।


मन तो सांसारिक मोह, वासना में लगा हुआ है और शरीर ऊपर रंगे हुए वस्त्रों से ढँका हुआ है इस प्रकार की वेशभूषा से साधुओं का सारा शरीर धारण तो कर लिया है लेकिन इससे भगवान की भक्ति नहीं हो सकती है। कारी गंजी पर रग्ड़ नहीं चढ़ता भगवान से रहित मन बिना रंगा कोरा ही रह जाता है ।


माया छाया एक सी, बिरला जानै कोय ।


भागत के पीछे लगे, सन्मुख भागे सोय ।।


कबीर साहब कह रहे हैं की माया और छाया एक समान हैं इसे कोई बिरला ही समझ सकता हैं, माया अज्ञानी के पीछे लग जाती है परन्तु ज्ञानी से दूर भाग जाती है।


जहाँ आपा तहाँ आपदा, जहाँ संशय तहाँ रोग ।


कह कबीर यह क्यों मिटे, चारों धीरज रोग ॥


कबीर साहब कहते हैं की जैसे ही मनुष्य में घमंड हो जाता है उस पर आपत्तियाँ आने लगती हैं और जहाँ संदेह होता है वहाँ वहाँ निराशा और चिंता होने लगती है। कबीरदास जी कहते हैं की यह चारों रोग धीरज से हीं मिट सकते हैं ।


आया था किस काम को, तू सोया चादर तान ।


सूरत सम्हाल ऐ गाफिल, अपना आप पहचान ॥


कबीर साहब कहते हैं की ऐ गाफिल ! तू चादर तान कर सो रहा है, अपने होश ठीक कर और अपने आप को पहचान, तू किस काम के लिए आया था और तू कौन है? स्वयं को पहचान और सही कर्म कर।


क्या भरोसा देह का, बिनस जात छिन मांह ।


साँस-साँस सुमिरन करो और यतन कुछ नांह ॥


इस शरीर का क्या भरोसा है यह तो पल-पल मिटता हीं जा रहा है इसीलिए अपने हर साँस पर हरी का सुमिरन करो और दूसरा कोई उपाय नहीं है।


गारी हीं सों उपजे, कलह, कष्ट और मींच ।


हारि चले सो साधु है, लागि चले सो नीच ॥


गाली से हीं कलह, दु:ख तथा मृत्यु पैदा होती है जो गाली सुनकर हार मानकर चला जाए वही साधु जानो यानी सज्जन पुरुष। और जो गाली देने के बदले में गाली देने लग जाता है वह नीच प्रवृति का है।


दुर्बल को न सताइए, जाकि मोटी हाय ।


बिना जीव की साँस सों, लोह भस्म हो जाय ॥


कबीर साहब कहते हैं की कमजोर को कभी नहीं सताना चाहिए जिसकी हाय बहुत बड़ी होती है जैसा आपने देखा होगा बिना जीव के आग को हवा देने वाले पखें की साँस यानी हवा से लोहा भी खत्म हो जाता है।


दान दिए धन ना घटे, नदी न घटे नीर ।


अपनी आँखों देख लो, यों क्या कहे कबीर ॥


तुम ध्यान से देखो कि नदी का पानी पीने से कम नहीं होता और दान देने से धन नहीं घटता।


अवगुण कहूँ शराब का, आपा अहमक़ साथ ।


मानुष से पशुआ करे, दाय गाँठ से खात ॥


कबीर साहब कहते हैं की मैं तुमसे शराब की बुराई करता हूँ कि शराब पीकर आदमी स्वयं पागल होता है, मूर्ख और जानवर बनता है और जेब से रकम भी लगती है सो अलग।


बाजीगर का बांदरा, ऐसा जीव मन के साथ ।


नाना नाच दिखाय कर, राखे अपने साथ ॥


कबीर साहब कह रहे हैं की जिस तरह बाजीगर अपने बन्दर से तरह-तरह के नाच दिखाकर अपने साथ रखता है उसी तरह मन भी जीव के साथ है वह भी जीव को अपने इशारे पर चलाता है।


अटकी भाल शरीर में, तीर रहा है टूट ।


चुम्बक बिना निकले नहीं, कोटि पट्ठ्न को फूट ।।


जैसे की शरीर में तीर कि भाला अटक जाती है और वह बिना चुम्बक के नहीं निकाल सकती इसी प्रकार तुम्हारे मन में जो खोट है वह किसी महात्मा के बिना नहीं निकल सकती, इसीलिए तुम्हें सच्चे गुरु कि आवश्यकता है।


कबीरा जपना काठ कि, क्या दिखलावे मोय ।


हृदय नाम न जपेगा, यह जपनी क्या होय ॥


इस लकड़ी की माला से ईश्वर का जाप करने से क्या होता है? यह क्या असर दिखा सकता है? यह मात्र दिखावा है और कुछ नहीं। जब तक तुम्हारा मन ईश्वर का जाप नहीं करेगा तब तक माला का जाप करने का कोई फायदा नहीं।


पतिव्रता मैली, काली कुचल कुरूप ।


पतिव्रता के रूप पर, वारो कोटि सरूप ॥


कबीर साहब कहते हैं कि पतिव्रता स्त्री चाहे मैली-कुचैली और कुरूपा हो लेकिन पतिव्रता स्त्री की इस एकमात्र विशेषता पर समस्त सुंदरताएँ न्योछावर हैं ।


वैद्य मुआ रोगी मुआ, मुआ सकल संसार ।


एक कबीरा ना मुआ, जेहि के राम अधार ॥


कबीर साहब कहते हैं कि बीमार मर गया और जिस वैद्य का उसे सहारा था वह भी मर गया। यहाँ तक कि सारा संसार भी मर गया लेकिन वह नहीं मरा जिसे सिर्फ राम का आसरा था। अर्थात राम नाम जपने वाला हीं अमर है।


हद चले सो मानव, बेहद चले सो साध ।


हद बेहद दोनों ताजे, ताको भाता अगाध ॥


जो मनुष्य सीमा तक काम करता है वह मनुष्य है। जो सीमा से अधिक कार्य की परिस्थिति में ज्ञान बढ़ावे वह साधु है । और जो सीमा से अधिक कार्य करता है, विभिन्न विषयों में जिज्ञासा कर के साधना करता रहता है उसका ज्ञान अत्यधिक होता है ।


राम रहे वन भीतरे, गुरु की पूजी न आस ।


कहे कबीर पाखंड सब, झूठे सदा निराश ॥


कबीर साहब कह रहे हैं की बिना गुरु की सेवा किए और बिना गुरु की शिक्षा के जिन झूठे लोगों ने यह जान लिया है कि राम वन में रहते हैं अतः परमात्मा को वन में प्राप्त किया जा सकता है, कबीर साहब कहते हैं यह सब पाखंड है। झूठे लोग कभी भी परमात्मा को ढूँढ नहीं सकते हैं, वे सदा निराश हीं होंगे ।


सुमरण से मन लाइए, जैसे पानी बिन मीन ।


प्राण तजे बिन बिछड़े, संत कबीर कह दिन ॥


कबीर साहब कहते हैं कि जैसे मछली जल से एक दिन के लिए भी बिछ्ड़ जाती है तो उसे चैन नहीं पड़ता। ऐसे हीं सबको हर समय परमात्मा के स्मरण में लगना चाहिए।


समझाये समझे नहीं, पर के साथ बिकाय ।


मैं खींचत हूँ आपके, तू चला जमपुर जाए ॥


कबीर साहब कह रहे हैं कि मैं तुम्हें अपनी ओर खींचता हूँ पर तू दूसरे के हाथ बिका जा रहा है और यमलोक कि ओर चला जा रहा है। मेरे इतने समझाने पर भी तू नहीं समझता ।


हंसा मोती विणन्या, कुंचन थार भराय ।


जो जन मार्ग न जाने, सो तिस कहा कराय ॥


सोने के थाल में मोती भरे हुए बिक रहे हैं। लेकिन जो उनकी कीमत नहीं जानते वह क्या करें, मोतियों को तो हंस रूपी जौहरी हीं पहचान कर ले सकता है।


नींद निशानी मौत की, उठ कबीरा जाग ।


और रसायन छांड़ि के, नाम रसायन लाग ॥


कबीर साहब कह रहे हैं की हे प्राणी ! उठ जाग, नींद मौत की निशानी है। दूसरे रसायनों को छोड़कर तू ईश्वर के नाम रूपी रसायनों मे मन लगा।


दुर्लभ मानुष जनम है, देह न बारम्बार ।


तरुवर ज्यों पत्ती झड़े, बहुरि न लागे डार ॥


कबीर साहब कह रहे हैं की यह मनुष्य जन्म बड़ी मुश्किल से मिलता है और यह देह बार-बार नहीं मिलता। जिस तरह पेड़ से पत्ता झड़ जाने के बाद फिर वापस कभी डाल मे नहीं लग सकता। अतः इस दुर्लभ मनुष्य जन्म को पहचानिए और अच्छे कर्मों मे लग जाइए।


शीलवन्त सबसे बड़ा, सब रतनन की खान ।


तीन लोक की सम्पदा, रही शील मे आन ॥


जो शील यानी शान्त एवं सदाचारी स्वभाव का होता है मानो वो सब रत्नों की खान है क्योंकि तीनों लोकों की माया शीलवन्त व्यक्ति में हीं निवास करती है।


माँगन मरण समान है, मति माँगो कोई भीख ।


माँगन ते मरना भला, यही सतगुरु की सीख ॥


कबीर साहब कह रहे हैं की माँगना मरने के बराबर है इसलिए किसी से भीख मत माँगो। सतगुरु की यही शिक्षा है की माँगने से मर जाना बेहतर है अतः प्रयास यह करना चाहिये की हमे जो भी वस्तु की आवश्यकता हो उसे अपने मेहनत से प्राप्त करें न की किसी से माँगकर।


माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रौंदे मोय ।


इक दिन ऐसा आएगा, मै रौंदूंगी तोय ॥


मिट्टी कुम्हार से कहती है कि तू मुझे क्या रौंदता है। एक दिन ऐसा आएगा कि मै तुझे रौंदूंगी। अर्थात मनुष्य की मृत्यु के पश्चात मनुष्य का शरीर इसी मिट्टी मे मिल जाएगा।


कबीरा ते नर अन्ध हैं, गुरु को कहते और ।


हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहीं ठौर ॥


कबीर साहब कह रहे हैं की वे नर अंधे हैं जो गुरु को परमात्मा से छोटा मानते हैं क्यूंकि परमात्मा के रुष्ट होने पर एक गुरु का सहारा तो है लेकिन गुरु के नाराज होने के बाद कोई ठिकाना नहीं है।


कबीरा सोया क्या करे, उठी न भजे भगवान ।


जम जब घर ले जायेंगे, पड़ी रहेगी म्यान ॥


कबीर साहब कह रहे हैं की हे प्राणी ! तू सोता रहता है जरा अपनी चेतना को जगाओ और उठकर भगवान को भज क्यूंकि जिस समय यमदूत तुझे अपने साथ ले जाएंगे तो तेरा यह शरीर खाली म्यान की तरह पड़ा रह जाएगा।


रात गंवाई सोय के, दिन गंवाई खाय ।


हीरा जनम अनमोल था, कौड़ी बदले जाय ॥


कबीर साहब कह रहे हैं की रात तो सोकर गंवा दी और दिन खाने-पीने में गंवा दिया। यह हीरे जैसा अनमोल मनुष्य रूपी जन्म को तुमने कौड़ियो मे बदल दिया।


जो टोकू कांटा बुवे, ताहि बोय तू फूल ।


तोकू फूल के फूल है, बाकू है त्रिशूल ॥


कबीर साहब कहते हैं की जो तेरे लिए कांटा बोय तू उसके लिए फूल बो। तुझे फूल के फूल मिलेंगे और जो तेरे लिए कांटा बोएगा उसे त्रिशूल के समान तेज चुभने वाले कांटे मिलेंगे।


आए हैं सो जाएंगे, राजा रंक फकीर ।


एक सिंहासन चढ़ि चले, एक बंधे जंजीर ॥


कबीर साहब बता रहे हैं की जो आया है वो इस दुनिया से जरूर जाएगा वह चाहे राजा हो, कंगाल हो या फकीर हो सबको इस दुनिया से जाना है लेकिन कोई सिंहासन पर बैठकर जाएगा और कोई जंजीर से बंधकर। अर्थात जिनके जीवन में सत्य होगा वो तो सम्मान के साथ विदा होंगे और जो बुरा काम करेंगें वो बुराई रूपी जंजीर मे बंधकर जाएंगे।


काल करे सो आज कर, आज करे सो अब ।


पल में प्रलय होएगी, बहुरि करेगा कब ॥


कबीर साहब कह रहे है की जो कल करना है उसे आज कर और जो आज करना है उसे अभी कर। समय और परिस्थितियाँ एक पल मे बदल सकती हैं, एक पल बाद प्रलय हो सकती हैं अर्थात किसी कार्य को कल पर मत टालिए ।



Kabir Ke Dohe:कबीर के दोहे


1."Dukh me sumiran sab kare, sukh me kare na koye. Jo sukh me sumiran kare, to dukh kahe ko hoye."

Translation: Everyone remembers God in times of distress, but no one remembers Him in times of joy. If you remember God in good times, why would you ever experience sorrow?


Explanation: This doha emphasizes the importance of remembering God at all times, not just when we are going through tough times. Kabir suggests that if we cultivate a habit of remembering God during times of happiness, we will be able to avoid suffering altogether.


2."Dheere-dheere re mana, dheere sab kuchh hoye. Mali seenche so ghara, ritu aaye phal hoye."

Translation: Slowly and steadily, everything will happen at the right pace. Just as a gardener waters a plant, and in due season it bears fruit.


Explanation: Kabir is encouraging us to be patient in life and trust that things will unfold at the right time. Like a gardener who tends to a plant, we too must take small steps and keep nurturing our goals until they come to fruition.


3."Saayiaan itna deejiye, ja mein kutumb samaye. Main bhi bhookha na rahun, sadhu na bhookha jaye."

Translation: O Lord, give me only so much that I can feed my family. Neither should I go hungry, nor should any sadhu (holy man) go hungry.


Explanation: This doha emphasizes the importance of living a simple life and taking care of those around us. Kabir suggests that we should only ask for what we need and share our blessings with others.


4."Jaise til mein tel hai, jyon chakmak mein aag. Tera sai tujh mein hai, tu jaag sake to jaag."

Translation: Just as a sesame seed has oil within it, and a flint has fire within it. The divine is within you, so awaken to it if you can.


Explanation: Kabir is reminding us that the divine is within us, and all we need to do is awaken to it. Just as oil is hidden within a tiny sesame seed, so too is the divine within us, waiting to be discovered.


5."Pothi padh padh jag mua, pandit bhayo na koye. Dhai aakhar prem ke, jo padhe so pandit hoye."

Translation: The world has perished reading scriptures, but no one became wise. Only those who have read the alphabet of love have become wise.


Explanation: This doha suggests that wisdom cannot be gained merely by reading books or reciting scriptures. It is only through the experience of love that one can attain true wisdom.


Kabir Ke Dohe:कबीर के दोहे -viral trends
Kabir Ke Dohe:कबीर के दोहे

6."Bura jo dekhan main chala, bura na milya koye. Jo dil khoja aapna, to mujhse bura na koye."

Translation: I went out looking for evil, but I found none. When I searched my own heart, that is when I found evil.


Explanation:


7."Bura jo dekhan main chala, bura na milya koye. Jo dil khoja aapna, to mujhse bura na koye."

Translation: I went out looking for evil, but I found none. When I searched my own heart, that is when I found evil.


Explanation: This doha emphasizes the importance of self-reflection and introspection. Kabir suggests that we must first look within ourselves to recognize and confront our own flaws before criticizing others.


8."Jaise jal mein kamal hai, phoolo mein chaman hai. Tera sayeen tujh mein hai, tu jaan sake to jaan."

Translation: Just as a lotus blooms in water, and a garden is full of flowers. The divine is within you, so realize it if you can.


Explanation: Kabir is reminding us that the divine is present within us and all around us. We must learn to see and appreciate the beauty and divinity in everything.


9."Bada hua to kya hua, jaise ped khajoor. Panthi ko chaya nahin, phal laage ati door."

Translation: What does it matter if one becomes great, like a date palm tree? If it doesn't provide shade to travelers, its fruit is of no use.


Explanation: This doha suggests that greatness is not just about personal achievement but also about serving others and making a positive impact on society.


10."Kabira khada bazaar mein, mange sabki khair. Na kahu se dosti, na kahu se bair."

Translation: Kabir stands in the marketplace, wishing well to all. Neither friendship nor enmity with anyone.


Explanation: Kabir believed in universal love and compassion. He suggests that we should treat everyone equally and wish well for everyone, regardless of their social status or background.


Kabir Ke Dohe:कबीर के दोहे
Kabir Ke Dohe:कबीर के दोहे

11."Bada hua to kya hua, jaise ped khajoor. Sab chadhe toh phal kahan se, laage ati door."

Translation: What does it matter if one becomes great, like a date palm tree? If everyone climbs on it, how will it bear fruit?


Explanation: This doha emphasizes the importance of humility and teamwork. Kabir suggests that greatness is not just about personal achievement, but also about working together and supporting one another.


12."Sukh dukh dono sam kar, jyoti na dekhya binu. Mili ek santoshi, mangal bhavan amangal haari."

Translation: Accepting both joy and sorrow, without seeing the light. Meeting a contented person, all troubles vanish.


Explanation: This doha suggests that true contentment comes from accepting both the good and the bad in life and finding inner peace. Kabir suggests that we should seek out contented people who can help us find peace and happiness.


13."Man changa to kathauti mein ganga."

Translation: If the mind is pure, even a small vessel can hold the holy Ganges river.


Explanation: This doha emphasizes the importance of having a pure mind and heart. Kabir suggests that even a small vessel can hold the holy Ganges river if it is pure, just as a pure mind can hold great wisdom and knowledge.


14."Jab main tha tab hari nahin, ab hari hai main nahin. Sab andhiyara mit gaya, deepak bane do prakash."

Translation: When I was there, God was not; now God is there, I am not. All darkness disappeared, and two lamps were lit.


Explanation: This doha suggests that when we let go of our ego and attachments, we can experience the presence of the divine within us. Kabir suggests that when we surrender ourselves to the divine, all darkness disappears and we become a source of light for others.


15."Dukh mein sumiran sab kare, sukh mein kare na koye. Jo sukh mein sumiran kare, toh dukh kahe ko hoye."

Translation: Everyone remembers God in times of sorrow, but no one remembers Him in times of joy. Those who remember Him in happiness, will never experience sorrow.


Explanation: This doha suggests that we often turn to God in times of hardship but forget about Him in times of happiness. Kabir suggests that if we cultivate a constant awareness of the divine, we will be able to find joy and contentment in all circumstances.


Kabir Ke Dohe:कबीर के दोहे
Kabir Ke Dohe:कबीर के दोहे

16."Dheere dheere re mana, dheere sab kuch hoye. Mali seenche so ghara, ritu aaye phal hoye."

Translation: Slowly, slowly, O mind, everything will come to pass. The gardener may water with a hundred jars, but the fruit only comes in its season.


Explanation: This doha emphasizes the importance of patience and perseverance. Kabir suggests that just as a gardener must patiently tend to his crops, we must also learn to be patient and trust in the natural flow of life.


17."Jhoothe ko darpane na dekho, sachhe ko sabse bhalo."

Translation: Don't look at the false one in the mirror, look at the true one.


Explanation: This doha suggests that we should focus on our true selves and not get caught up in superficial appearances or false identities. Kabir suggests that the true self is the one that is aligned with the divine and connected to the source of all truth and goodness.


18."Guru govind dono khade, kaake lagoo paay. Balihari guru aapne, govind diyo milay."

Translation: Guru and God both are here, to whom should I bow down? I choose to bow down to my Guru, as he has shown me the way to God.


Explanation: This doha emphasizes the importance of having a spiritual guide or teacher who can help us on our path to enlightenment. Kabir suggests that the guru is the one who can show us the way to the divine and help us to connect with our true selves.


19."Pothi padh padh jag mua, pandit bhaya na koye. Dhai akhar prem ke, jo padhe so pandit hoye."

Translation: The world has died reading books, but none have become wise. One who has mastered the art of love, is the true wise one.


Explanation: This doha suggests that true wisdom cannot be gained from reading books or acquiring knowledge alone. Kabir suggests that true wisdom comes from mastering the art of love, which involves cultivating a deep and compassionate understanding of oneself and others.


20."Kasturi kundal base, mrig dhundhe ban maahi. Aise ghati ghati ram hai, duniya dekhe naahi."

Translation: The musk is in the deer, but the deer searches in the forest. God is within us, but we search for Him in the world.


Explanation: This doha emphasizes the importance of turning inward and seeking the divine within ourselves. Kabir suggests that the source of all truth and goodness is within us, but we often look for it outside ourselves.


Kabir das Ke Dohe:कबीर के दोहे
Kabir Ke Dohe:कबीर के दोहे

21."Bura jo dekhan main chala, bura na milya koye. Jo dil khoja aapna, to mujhse bura na koye."

Translation: As I went out to see the world, I found no one as evil as myself. When I looked inward, I found no one worse than me.


Explanation: This doha emphasizes the importance of self-reflection and self-awareness. Kabir suggests that it is easy to criticize and judge others, but true wisdom and growth come from looking inward and confronting our own flaws and shortcomings.


22."Jaise til mein tel hai, jyon chakmak mein aag. Tera sayeen tujh mein hai, tu jaag sake toh jaag."

Translation: Just as oil is in the sesame seed, and fire is in the flint, your God is within you, if only you can awaken.


Explanation: This doha emphasizes the importance of recognizing the divine within ourselves. Kabir suggests that just as oil and fire are inherent in certain objects, the presence of the divine is inherent in each of us. We must awaken to this reality in order to fully realize our potential and purpose.


23."Maati kahe kumbhar se, tu kya rondhe mohe. Ek din aisa aayega, main rondhu gi toye."

Translation: The clay pot says to the potter, "Why do you keep kneading me?" One day will come when I will knead you.


Explanation: This doha emphasizes the transience of life and the importance of humility. Kabir suggests that just as a clay pot is shaped and molded by a potter, we too are subject to the forces of life and must remain humble in the face of our own mortality.


24."Mangan maran saman hai, mat maan koi bheekh. Mangan se milti murad, mann se milti cheez."

Translation: Begging is like death, so do not accept charity. What you desire can only be obtained by your own efforts.


Explanation: This doha emphasizes the importance of self-reliance and self-determination. Kabir suggests that begging for charity or relying on the help of others will not lead to true fulfillment. Instead, we must work hard and strive to achieve our goals through our own efforts.


25."Paani mein meen pyasi, pyasi rehna sajan. Saajan bin paani bin, sab soona lage van."

Translation: The fish is thirsty in the water, but it longs for its mate. Without its mate or water, everything appears barren.


Explanation: This doha emphasizes the importance of love and companionship. Kabir suggests that just as a fish longs for its mate, we too long for connection and intimacy with others. Without love and companionship, life can feel empty and barren.


Kabir Ke Dohe:कबीर के दोहे
Kabir Ke Dohe:कबीर के दोहे

Conclusion:


Kabir's dohas offer timeless wisdom and insight into the human experience. They remind us of the importance of humility, self-awareness, compassion, and devotion to the divine. By following Kabir's teachings, we can cultivate a deeper understanding of ourselves and our place in the world, and live a more fulfilling and meaningful life.


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